आलाप' अभ्यास से स्वरों की स्पष्टता, सांस पर नियंत्रण और गले में मधुरता आती है


 भारतीय संगीत में 'आलाप' धीमी गति में बिना किसी ताल-बद्धता के राग के स्वरों का विस्तार है。 इसके अभ्यास से से  स्वरों की स्पष्टता, सांस पर नियंत्रण और मधुरता आती है。

 अभ्यास की शुरुआत हमेशा सटीक 'सा' (षड्ज) से करें.  स्वर बिल्कुल भी न भटके。स्वर-स्थान और ठहराव: आलाप में प्रत्येक स्वर का स्थान (पिच) बहुत महत्वपूर्ण है。 

किसी एक स्वर पर रुककर उसे सीधा और स्थिर गाने का अभ्यास करें स्वरों के बीच की दूरी को समझना आवश्यक है。 जैसे 'सा' से सीधे 'ग' या 'प' पर कैसे जाएं。

  • मींड और गमक का प्रयोग करें; आलाप गाते समय एक स्वर से दूसरे स्वर तक बिना टूटे जाने को 'मींड' कहते हैं。 
  • मींड, खटके और कण-स्वरों के अभ्यास से आलाप में भाव पैदा होता है。
  • आलाप गाते समय अपना मुंह पूरा खोलकर 'आ' शब्द का उच्चारण करें।
  • आ, ना, ता, नोम-तोम का उपयोग: आलाप गाते समय शब्दों (जैसे 'आ') का उच्चारण करें, ताकि गले का खुलापन और सांस का प्रवाह एक समान रहे。 
  • वादी स्वर पर सबसे ज्यादा ठहराव और जोर दें l 

आलाप को हमेशा तीन भागों में बांटकर रियाज़ किया जाता है:

  • विलंबित (धीमी गति): इसमें राग के मुख्य स्वरों पर बहुत धीरे-धीरे और रुक-रुक कर ध्यान दिया जाता है।
  • मध्य (मध्यम गति): इसमें स्वरों की गति थोड़ी बढ़ती है और स्वर-समूह (Phrases) बड़े होने लगते हैं ।
  • द्रुत (तेज गति): इसमें बिना ताल के ही स्वरों को तेजी से आपस में जोड़ा जाता है।

निरंतर अभ्यास से आप किसी भी राग में बेहतरीन और भावपूर्ण आलाप कर सकेंगे

अभ्यास

बीते पल को भूलो,
आने वाले से न डरो।
जो हैं, जो नहीं रहे,
सब एक धारा बहें।


ज्ञान से मन को भरो ,
चिंता की गठरी झरो।
सबका सार यही है,
शांति का द्वार यही है।

जीवित हम, पल-पल जी लें जान,
मृत्यु अटल, मानें विधान।
ज्ञान की ज्योति जलाओ,
अंधकार दूर भगाओ।

ज्ञानी बनो 
शोक मत करो 
गत-आगत, जीवित, मृत वास्ते 

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