मन-इन्द्रिय विजय करो: बोल अलाप


 मन-इन्द्रिय विजय करो: बोल अलाप 

मन दिखता है,  है वो छाया,
साफ़ मन की,  बस एक माया।
सच्चा मन तो,  ढका हुआ है,
प्रकृति, कर्मों से,  बँधा हुआ है।

इंद्रियां हर पल, लुभाती राहें,
मन चाहे रंग, मन चाहे चाहें।
आंखें देखतीं, सुन्दर आकार,
कान सुनते मीठा, हर बार।

मन अकेला, अंतर गहरा,
उलझन भरी है राह।
सुख भागे, आनंद रूठे,
चंचल मन की चाह।

स्थिरता बिन, शांति खोई,
बैचेनी का शोर।
अंतर पाटे, मन को साधें,
खुशी का मिले छोर।

पर इंद्रियों को वश में लाना,
मन को शांत, स्थिर बनाना।
ये ही वीरता, ये ही पराक्रम,
इंद्रियों पर विजय, सबसे उत्तम।

Comments

Popular posts from this blog

एकं ब्रह्म द्वितीय नास्ति नेह ना नास्ति किंचन: ब्रह्म ज्ञान का मूल मंत्र एवं सूक्ष्म बोल आलाप

An ink attack at Jantar Mantar and aftermath