निष्काम भाव साधो, मुक्ति पाओ : कविता

 


मन को साधो, बुद्धि जगाओ, बुद्धि से विवेक को पाओ।
विवेक से जागे, निर्मल भाव, भाव में पनपे, श्रद्धा  चाव।

श्रद्धा जागे, दिव्य हो मन, कर्म करो फिर, पावन बन।
एहसास जगाओ, कर्म करो निष्काम, मुक्ति पाओ।

मन चंचल को पहले साधो, बुद्धि की राह तब पाओ।
भेद सही-गलत का जानो, बुद्धि को अब विवेक बनाओ।

जो विवेक से ज्ञान मिले, उसको भाव में फिर तुम लाओ 
इस भाव को श्रद्धा में बदलो, आस्था गहरी कर पाओ।

श्रद्धा से अब दिव्य भाव जगाओ, अंतर मन में ज्योति फैलाओ।
जब दिव्य भाव से भर जाओ, फिर निष्ठा से कर्म कमाओ।

हर भाव को अपने साधो, भाव को स्थिर करते जाओ ।
मुक्ति का तब मार्ग मिलेगा, हर कर्म तब सार्थक पाओ।

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